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हरीश रावत के ट्वीट के ट्विस्ट से भाजपा सुकून में, महंगाई पर प्रदर्शन से दूर रहा हरीश गुट

शनिवार को महंगाई पर प्रदेश संगठन ने किया प्रदर्शन तो हरीश रावत ने ट्वीट कर कांग्रेस की अंदरूनी जंग को किया तेज

अंदर और बाहर दोनों मोर्चों पर लड़ रही कांग्रेस। हरीश रावत के पुराने करीबी पूर्व विधायक रंजीत रावत ने लिया प्रदर्शन में हिस्सा। हरीश गुट ने महंगाई पर हुए प्रदर्शन से किया किनारा

अविकल उत्त्तराखण्ड

देहरादून। कांग्रेस नेता हरीश रावत के ट्वीट के ट्विस्ट जारी है। उत्त्तराखण्ड कांग्रेस दो दो मोर्चों पर जंग में उलझी है। महंगाई पर भाजपा को घेर रही है तो पूर्व सीएम हरीश रावत दनादन ट्वीट कर अंदरूनी कशमकश को बरकरार रखे हुए है।

शनिवार को नेता प्रतिपक्ष इंदिरा ह्रदयेश व प्रीतम सिंह समेत अन्य नेता-कार्यकर्ता महंगाई को लेकर सड़क पर उतरे। प्रदर्शन किया और भाजपा को गरियाया। कहा कि, भाजपा राज में अच्छे दिन आने के बजाय गैस सिलिंडर, पेट्रोल व अन्य जरूरत का सामान महंगा हो गया है। देहरादून में हुए प्रदर्शन में हरीश रावत गुट के लोगों ने साफ साफ दूरी बना कर रखी। हरीश रावत विधानसभा चुनाव में चेहरा घोषित करने के मुद्दे को लेकर अड़े हुए हैं। और संगठन के कार्यक्रमों से फिलहाल दूरी बनाते हुए अपने कार्यक्रम अलग से कर रहे हैं।

इधर, दो दिन पूर्व ही नेता प्रतिपक्ष इंदिरा ह्रदयेश ने एक बार फिर कह दिया कि 2017 में हरीश रावत ही चेहरा थे और दो जगह से हार गए । जवाब में हरदा ने शनिवार को ही नया ट्वीट जारी करते हुए कह दिया कि किच्छा व हरिद्वार की हार के साथ सभी 59 विधानसभा सीटों पर हार की जिम्मेदारी लेता हूँ। हरीश रावत ने पुराने रिकॉर्ड तलाशते हुए बता दिया कि 2017 में कितनी सभाएं की। कहा कि, जीत के विशेषज्ञों के आस पास की सीट पर 2007 से लगातार क्यों हारते जा रहे हैं। इसके अलावा ताजे ट्वीट में और भी है बहुत कुछ।

कांग्रेस के अंदर लगातार उलझती जा रही चेहरे की जंग से भाजपा काफी राहत में है। हरीश रावत के ट्वीट के ट्विस्ट से चुनावी गणित का तराजू कहीं भी उठ व गिर सकता है।

पूर्व सीएम हरीश रावत के ताजे ट्वीट के मजमून

आज मैंने पुराने रिकॉर्ड तलाशे, #विधानसभा_चुनाव 2017 में चुनाव के दौरान मैंने 94 सार्वजनिक सभाएं की, जिनमें #किच्छा में नामांकन के दिन की सार्वजनिक सभा भी सम्मिलित है, #हरिद्वार में तो मैं कोई सार्वजनिक सभा कर ही नहीं पाया। शायद मेरे मन में यह विश्वास रहा कि सारे राज्य में चुनाव प्रचार का दायित्व मेरा है और किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण में #चुनाव_प्रचार का दायित्व मेरे सहयोगी-साथी संभाल लेंगे। यह भी एक बड़ी विडंबना है कि जो लोग चुनाव के दौरान अपने क्षेत्र से बाहर, किसी भी विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार में नहीं गये, वो मुझसे 59 सीटों की हार का हिसाब चाहते हैं, हारें पहली भी हुई, हारें बाद में भी हुई। मैंने न बाद की हारों का #हिसाब मांगा है, क्योंकि मैंने उन हारों को भी सामूहिक समझा है और जो पहले की हारें हैं, मैंने किसी से यह नहीं पूछा कि क्या कारण है जो चुनावी #जीत के विशेषज्ञ हैं, उनके चारों तरफ की सीटों में 2007 से हम लगातार क्यों हारते आ रहे हैं? यह भी एक खोज का विषय है और जो आज अपने को अपराजेय मानकर चलते हैं, चुनावी हारों के कड़वे घूट तो सबको कभी न कभी पीने पड़ते हैं। एक ऐसा चुनाव हुआ था जिसमें एक #राष्ट्रीय दल की आंधी चली थी और उसके ऐसे भी उम्मीदवार थे जो अपनी जमानत नहीं बचा पाये थे, लेकिन समय का फेर है #कांग्रेस की शक्ति जब हाथ में आई तो वो लोग कभी पराजित न होने वाले #योद्धा की तरीके से दिखाई देते हैं तो जीत का श्रेय कभी-कभी हमको, पार्टी के उन साथियों के साथ भी बांटना चाहिये, जिनके परिश्रम के बल पर हमको यह सौभाग्य हासिल होता है और मैंने तो 2017 की चुनावी पराजय का केवल 2 ही सीटों पर क्यों? 59 सीटों पर भी हार का दायित्व अपना माना है और उसके लिये पूरी जिम्मेदारी, अपने कंधों पर ली है।
                          “जय हिंद, जय उत्तराखंड”।

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