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स्मार्ट सिटी में अवरोध

अब आठ साल बाद हुए आकलन से सामने आया है कि स्मार्ट सिटी की महत्त्वाकांक्षी परियोजना अपने घोषित मकसद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पाई है। भारत के अधिकांश शहर आज भी विभिन्न कारणों से भारी दबाव में हैं। भारत में स्मार्ट सिटीज मिशन की शुरुआत जून 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इस मिशन के तहत देश भर के सौ शहरों को चुना गया और बताया गया था कि  वहां आधुनिक आधारभूत ढांचा विकसित करके उन्हें एक साफ-सुथरे पर्यावरण वाला नगर बनाया जाएगा। सरकार ने इसके लिए शुरुआती तौर पर 22 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम आवंटित की थी। लेकिन अब आठ साल बाद हुए आकलन से सामने आया है कि ये महत्त्वाकांक्षी योजना अपने घोषित मकसद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पाई है।

भारत के अधिकांश शहर आज भी बाहर से आने वाले श्रमिकों की बढ़ती संख्या के कारण भारी दबाव में हैं। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें, तो उनमें दावा किया गया है कि तय परियोजनाओं में से करीब 73 फीसदी पूरी हो चुकी हैं। लेकिन एक गैर-सरकारी संस्था सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि परियोजनाएं देर से चल रही हैं। इनके बीच कुछ शहरों का रिकॉर्ड तो अच्छा है, लेकिन अन्य शहरों का प्रदर्शन खराब रहा है। यह विषमता की झलक इन परियोजनाओं के लिए दिए गए धन के उपयोग में भी देखी जा सकती है। यहां ये बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि आरंभ में स्मार्ट सिटी मिशन को 2020 तक पूरा कर लेने की उम्मीद जताई गई थी।

ये बात सही है कि 2020 से कोरोना महामारी का कहर टूट पड़ा। इसे देखते हुए परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य 2023 तक बढ़ा दिया गया। अब कई शहरों में इस समयसीमा को एक बार फिर से बढ़ाकर इसे जून 2024 तक खिसका दिया है। इस बीच मुंबई सहित कई शहरों ने राजनीतिक असहमति के कारण परियोजना से बाहर निकलने का फैसला भी कर लिया। बेशक परियोजना का मकसद अच्छा था। भारतीय शहर एक तरह की अराजकता के शिकार हैं, जिन्हें नियोजित करने की बेहद जरूरत है। शहरों के बुनियादी ढांचे को जलवायु के अनुकूल और टिकाऊ बनाना, किफायती आवास मुहैया कराना, पर्याप्त बिजली-पानी और प्रभावी कचरा प्रबंधन जैसी सुविधाएं प्रदान करना- ऐसे लक्ष्य हैं, जिन्हें जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए। मगर असल सवाल अमल का है, जिसमें बात कहीं पिछड़ गई है।

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