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गढ़वाली कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल पर केंद्र से मांग

गीता रेखरी

नई दिल्ली। रविवार दिल्ली के जंतर मंतर में उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच द्वारा गढ़वाली कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल किये जाने की वर्षों पुरानी मांग को केन्द्र सरकार से पूरा करने का आग्रह करते हुए एक दिवसीय धरने का आयोजन किया गया।

मंच के समन्वयक एवं मीडिया सचिव अनिल पन्त के द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार गढ़वाली और कुमाउनी भाषायें सदियों पुरानी भाषायें तो है ही, तो वही हजारों पुस्तकें गढ़वाली व कुमाउनी भाषाओं प्रकाशित है। साहित्य की सभी विधाओं में सैकड़ों काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, नाटक, एकांकी, उपन्यास, संस्मरण साक्षात्कार, निबन्ध एवं महाकाव्य तथा भाषा में व्याकरण एवं शब्दकोश आदि प्रकाशित हैं। तो वही आजादी से पहले भी दोनो राजभाषा रही है, जो आज भी करोड़ों लोगो में बोले जाने वाली भाषा है। जिनमें आधी आबादी प्रवासी उत्तराखण्डियों की है। इन दोनो भाषाओं में समाचार पत्र पत्रिकायें, नाटक, न्यूज पोर्टल, लोकसंगीत सहित अस्सी के दशक से निरंतर फिल्म आदि के माध्यमों से प्रचार मिल रहा है। वही दूरदर्शन और आकाशवाणी भी गढ़वाली कुमाउनी भाषाओं में कवितायें, गीत, वार्ता आदि का प्रसारण कर रहा है। तो प्राथमिक पाठशालाओं से लेकर माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा में भी गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं में बच्चों को शिक्षा प्रदान की जा रही है। इसके साथ ही नई शिक्षा नीति के तहत प्रशासन एवं सरकार के स्तर पर पाठ्यक्रम तैयार किया जार रहा है।

साहित्य और हिन्दी अकादमी सहित कई सरकारी संस्थाओं एवं संगठनों के द्वारा समय-समय पर गढ़वाली- कुमाउनी भाषा के साहित्यकारों को सम्मान सहभाषा सम्मान प्रदान किये जाते रहे हैं। वही प्रवासी उत्तराखण्डियों की जनसंख्या को देखते हुए दिल्ली सरकार द्वारा दोनो भाषाओं की अकादमी का गठन किया गया है।

लोक साहित्य में जागर-मागल में, बसती रिष्ट, प्रीतम भरतवाण एवं डॉ माधुरी बड़थ्वाल को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसका असर यह रहा की आज सोशल मीडिया में गढ़वाली कुमाउनी में खूब लिखा एवं सुना जा रहा है, तो वही लोक सभा के शून्य सत्र में सांसद सतपाल महाराज और अजय भट्ट द्वारा गढ़वाली कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए अपनी बात रखी गई है। मंच द्वारा केन्द्र सरकार से पुरजोर मांग करते हुए गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने पर जोर दिया जिससे उत्तराखंड की इन प्रमुख भाषाओं को उचित सम्मान मिल सके तो इसका भाषायी धरातल और अधिक विस्तार पा सके। इस अवसर पर जाने माने पत्रकार देवी सिंह रावत, कांग्रेस के उपाध्यक्ष धीरेंद्र प्रताप, लेखिका रामेश्वरी नादान सहित कई साहित्यकार, पत्रकार बुद्धिजीवियों तथा समाज सेवियों ने भाग लिया।

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