Headline
मसूरी के रॉक स्टोन पर चला एमडीडीए का बुलडोजर, अपर माल रोड पर अनाधिकृत निर्माण ध्वस्त
मसूरी के रॉक स्टोन पर चला एमडीडीए का बुलडोजर, अपर माल रोड पर अनाधिकृत निर्माण ध्वस्त
संसाधनों और अवसरों की कमी किसी प्रतिभाशाली युवा के सपनों की राह में नहीं बनेगी बाधा- मुख्यमंत्री
संसाधनों और अवसरों की कमी किसी प्रतिभाशाली युवा के सपनों की राह में नहीं बनेगी बाधा- मुख्यमंत्री
‘श्रमिक अपने पसीने से प्रदेश के विकास की नई इबारत लिख रहे’- महाराज
‘श्रमिक अपने पसीने से प्रदेश के विकास की नई इबारत लिख रहे’- महाराज
स्वस्थ बालिकाएं ही स्वस्थ और सशक्त समाज की नींव रखती हैं- ऋतु खण्डूडी भूषण
स्वस्थ बालिकाएं ही स्वस्थ और सशक्त समाज की नींव रखती हैं- ऋतु खण्डूडी भूषण
जनता मिलन में 19 शिकायतें दर्ज, अधिकांश का मौके पर निस्तारण
जनता मिलन में 19 शिकायतें दर्ज, अधिकांश का मौके पर निस्तारण
स्वस्थ बालिकाएं ही स्वस्थ और सशक्त समाज की नींव रखती हैं- ऋतु खण्डूडी भूषण
स्वस्थ बालिकाएं ही स्वस्थ और सशक्त समाज की नींव रखती हैं- ऋतु खण्डूडी भूषण
उत्तराखण्ड के विकास का रास्ता इकोलॉजी और इकोनॉमी के संतुलन से होकर निकलेगा- मुख्यमंत्री
उत्तराखण्ड के विकास का रास्ता इकोलॉजी और इकोनॉमी के संतुलन से होकर निकलेगा- मुख्यमंत्री
उत्तराखंड में बढ़ा लंपी रोग का खतरा, 21 पशुओं में संक्रमण की पुष्टि, एक बछड़े की मौत
उत्तराखंड में बढ़ा लंपी रोग का खतरा, 21 पशुओं में संक्रमण की पुष्टि, एक बछड़े की मौत
उत्तराखंड में बढ़ा लंपी रोग का खतरा, 21 पशुओं में संक्रमण की पुष्टि, एक बछड़े की मौत
उत्तराखंड में बढ़ा लंपी रोग का खतरा, 21 पशुओं में संक्रमण की पुष्टि, एक बछड़े की मौत

बुजुर्गों ही नहीं, युवाओं और बच्चों में भी बढ़ रही सुनने की समस्या, जानिए इसके कारण

बुजुर्गों ही नहीं, युवाओं और बच्चों में भी बढ़ रही सुनने की समस्या, जानिए इसके कारण

आमतौर पर यह माना जाता है कि सुनने की क्षमता उम्र बढ़ने के साथ कम होती है, लेकिन अब यह समस्या केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई है। हाल के वर्षों में युवाओं और बच्चों में भी कम सुनाई देने और बहरेपन के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार तेज आवाज में लंबे समय तक संगीत सुनना, कानों में संक्रमण, चोट, अधिक वैक्स जमा होना और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव भी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। समय रहते ध्यान न देने पर यह समस्या स्थायी बहरेपन में भी बदल सकती है।

बहरेपन के पीछे क्या हैं कारण

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि सुनने की क्षमता कम होने के कई कारण हो सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ कान के अंदर मौजूद संवेदनशील हिस्सों में धीरे-धीरे क्षति होने लगती है और रक्त संचार भी कम हो जाता है, जिससे सुनने में दिक्कत आती है। इसके अलावा तेज आवाज, जैसे डीजे या धमाके जैसी ध्वनियां कान के भीतर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कान में संक्रमण, खसरा जैसी बीमारियां और कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी सुनने की समस्या के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

समय पर इलाज न होने पर बढ़ सकती है परेशानी

स्वास्थ्य संगठनों की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोग सुनने की क्षमता में कमी से जूझ रहे हैं। यदि कान की सामान्य समस्या का समय पर इलाज न कराया जाए तो यह स्थायी बहरेपन का कारण बन सकती है। कम सुनाई देने का असर केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। लंबे समय तक इस समस्या से जूझ रहे लोगों में अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएं भी देखी गई हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार 85 डेसिबल से अधिक तेज आवाज में रहने से कान के अंदरूनी हिस्से को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां भी सुनने की क्षमता कम होने के जोखिम को बढ़ाती हैं।

क्या बहरेपन का इलाज संभव है?

डॉक्टरों का कहना है कि हर प्रकार का बहरापन स्थायी नहीं होता। यदि सुनने की समस्या कान में मैल जमा होने या संक्रमण की वजह से है तो सही इलाज और दवाओं से सुनने की क्षमता वापस आ सकती है। हालांकि यदि कान के अंदर की संवेदनशील कोशिकाएं स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, तो इसे पूरी तरह ठीक करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मामलों में हियरिंग एड जैसे उपकरण मरीजों की मदद करते हैं।

नवजात शिशुओं में यदि सुनने की समस्या का समय रहते पता चल जाए तो कुछ मामलों में उपचार के जरिए स्थिति में सुधार संभव होता है।

जीन थेरेपी से नई उम्मीद

हाल के वर्षों में वैज्ञानिक शोधों ने बहरेपन के इलाज की दिशा में नई उम्मीदें भी जगाई हैं। वर्ष 2025 में स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में जीन थेरेपी के जरिए जन्मजात बहरेपन के इलाज की संभावना सामने आई। अध्ययन में शामिल कुछ मरीजों में एक विशेष इंजेक्शन के बाद सुनने की क्षमता में सुधार देखा गया। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक को व्यापक रूप से अपनाने से पहले अभी और बड़े स्तर पर परीक्षण की जरूरत है।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार की गई है।

(साभार)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back To Top