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..बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

आप पार्टी के सीएम चेहरे रहे कर्नल अजय कोठियाल का इस्तीफा

अविकल थपलियाल

…कर्नल अजय कोठियाल के इस्तीफे की खबर से दिल दिमाग पर पहली पंक्ति यही कौंधी .. बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले…दरअसल कर्नल अजय कोठियाल का गैर राजनीतिक एटीट्यूड ही उनकी सबसे बड़ी कमी बन गयी।

केजरीवाल के आशीर्वाद के बाद सीएम का चेहरा घोषित होने के बावजूद कर्नल कोठियाल सभी को साथ लेकर भी नहीं चल पाए और न ही जोड़ने में ही सफल हुए। कुछ नौकरशाह व अन्य नेता उनके नेतृत्व को दरकिनार करते हुए आप पार्टी छोड़ गए। राजनीति के चतुर खिलाड़ी की तरह उन्होंने किसी को भी रोकने की कोशिश नहीं की।

बीते विधानसभा चुनाव से पहले जिस अंदाज से केजरीवाल ने जनता को दी गयी गारंटी के बूते आप पार्टी की हवा बनाने की कोशिश की थी। उस हवा को कर्नल कोठियाल आगे नहीं बढ़ा सके। फौजी होने की वजह से कर्नल कोठियाल से बहुत राजनीतिक व चुनावी चातुर्य की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी।

आप पार्टी के सीएम के चेहरे का गंगोत्री से चुनाव लड़ना और अपनी जमानत तक नहीं बचा सकना भी कर्नल कोठियाल की राजनीतिक जमीन  की सच्चाई बयां करने के लिए काफी था। कर्नल ने उत्तरकाशी के इस इलाके में कई युवाओं को ट्रेनिंग भी दी थी। बावजूद इसके चुनाव में कर्नल कोई करिश्मा नहीं दिखा सके।

विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी बमुश्किल 3.31 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई।जबकि चुनाव प्रचार में केजरीवाल की पार्टी ने भाजपा व कांग्रेस को कड़ी टक्कर भी दी। कई रोड शो किये। काफी पैसा भी बहाया। रोजगार गारंटी के साथ मुफ्त बिजली पानी व बोनस देने का वादा किया। विधानसभा चुनाव में कर्नल समेत कमोबेश सभी उम्मीदवार  उम्मीद से बहुत पीछे रहे।

चुनाव  परिणाम के बाद से ही केजरीवाल ने कर्नल कोठियाल की ‘उपयोगिता’ को बूझते हुए किनारे करने की कोशिश शुरू भी कर दी थी। प्रदेश स्तर पर संगठन में हुए बदलाव में भी कर्नल से कोई सलाह मशविरा किया गया और न ही कर्नल पार्टी के किसी मंच पर दिखाई दिए। लिहाजा, लगातार हो रही उपेक्षा के बाद कर्नल के लिए पार्टी से सम्मानजनक तरीके से बाहर निकल जाना ही एकमात्र रास्ता बचा था। और बुधवार को कर्नल ने इस्तीफा देने में ही भलाई समझी।

कर्नल के इस्तीफे से आप पार्टी को कोई झटका भी नहीं लगा। क्योंकि कि पूरे ताम झाम के साथ सीएम का चेहरा घोषित होने के बाद भी कर्नल पार्टी के अंदर और बाहर एक पॉलिटिकल फ़ोर्स (राजनीतिक ताकत) नहीं बन पाए। कर्नल के पीछे कितनी जनता है यह भी केजरीवाल समझ गए।

सेना में रहकर कई वीरता मेडल अपने नाम करने वाले कर्नल अजय कोठियाल उत्तराखंड की उबड़ खाबड़ व पथरीली राजनीतिक जमीन पर लड़खड़ा गए। जनरल टीपीएस रावत व जनरल बीसी खंडूड़ी की तरह राजनीति की ठीक ठाक पारी खेलने से पहले ही अपनी पिच पर बोल्ड हो गए।

बेशक कर्नल उत्तराखंड की राजनीति में स्वंय को स्थापित नहीं कर पाए लेकिन बतौर सैन्य अधिकारी उनकी उपलब्धियों को कतईं  नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2013 की आपदा के बाद केदार पुनर्निर्माण में भी कर्नल की भूमिका की बार बार चर्चा होती रहेगी। लेकिन प्रदेश की राजनीति के कच्चे खिलाड़ी साबित हुए कर्नल के इस्तीफे ने यह भी साफ कर दिया कि वे हथकंडे वाली राजनीति के खांचे में कहीं से भी फिट नहीं बैठते…

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