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खाली नाम का ऊर्जा प्रदेश बन गया है उत्तराखंड,लगभग 15 से ज्यादा परियोजनाओं के बावजूद भी बिजली की कमी

देहरादून।9 नवंबर सन 2000 को जब उत्तराखंड बना तो इसे ऊर्जा प्रदेश नाम दिया गया। राज्य के 22 साल के सफर को अगर देखें तो अब ऊर्जा प्रदेश एक जुमला लगता है। उत्तराखंड में ऊर्जा संकट लगातार बना हुआ है. उत्तराखंड की 17 विद्युत परियोजनाओं के बावजूद राज्य को बिजली खरीदनी पड़ रही है।

उत्तराखंड में ऊर्जा को लेकर इस संकट के बीच एक सवाल यह भी है कि यदि राज्य अपनी जरूरत की बिजली भी उत्पादन नहीं कर पा रहा है तो फिर उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश क्यों कहते हैं. इसके पीछे की वजह वह नदियां और ग्लेशियर हैं जो प्रदेश को निर्बाध धाराप्रवाह जल उपलब्ध कराता है. एक अनुमान के अनुसार प्रदेश में मौजूद नदियों से उत्तराखंड करीब 20,000 मेगावाट जल विद्युत उत्पादन कर सकता है. जबकि प्रदेश अभी इसका एक चौथाई भी उत्पादन नहीं कर रहा है।

उत्तराखंड में बिजली की कमी के चलते ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर उद्योगों तक में पिछले दिनों बिजली की खूब कटौती की गई. इसका सीधा असर लोगों पर तो पड़ा ही साथ ही उद्योगों के उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ा. स्थिति यह है कि अब यूपीसीएल ने उत्तराखंड सरकार से मदद मांगी है और इसके अलावा साल में दूसरी बार बिजली के दामों में बढ़ोत्तरी करने की भी पेशकश की है।

उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश तो कहा गया लेकिन कभी इस सपने को साकार ही नहीं किया जा सका।स्थिति यह रही कि नदियों के रूप में राज्य की बहुमूल्य संपदा का इस्तेमाल सरकारें नहीं कर पायीं, और बढ़ती मांग के बीच विद्युत संकट राज्य के विकास पर भारी पड़ने लगा है. हालांकि कुछ परियोजनाएं हैं जो अब भी राज्य की उम्मीद बनी हुई हैं. मौजूदा ऊर्जा संकट के दौरान अब धामी सरकार उन्हीं परियोजनाओं को धरातल पर उतारने की कवायद में जुट गई है।

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