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उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में हो रही है पानी की बर्बादी,समरसेबल के पानी से धो रहे गाड़ियां और सड़क

देहरादून।विश्व पर्यावरण दिवस, जल दिवस, पृथ्वी दिवस जैसे कार्यक्रम के माध्यम से जीवनदायिनी जल को बचाने का संकल्प लेने वाले लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।उत्तराखंड में आज भी लोग सबमर्सिबल से पानी बहाते हुए दिख जाते हैं। इतना ही नहीं वाहनों से लेकर सड़क तक की सफाई करते हैं। अगर यह कहा जाए कि रोजाना हजारों लीटर पानी की बर्बादी हो रही है तो यह गलत नहीं हैं। यह आलम तब है जब पूरा जिला भीषण जल संकट से जूझ रहा है। जिले के कई गांव और कस्बे ऐसे हैं जहां लोग पानी के लिए तरस रहे हैं। दिन निकलने के साथ ही टैंकर व हैंडपंप पर एक अदद बाल्टी पानी के लिए लोग घंटों लाइन लगाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं, जो हजारों लीटर पानी को जमीन से निकालकर कार, फर्श व सड़कों को धो रहे हैं। इस तरह के नजारे आम होने के बावजूद भी कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। पानी का स्तर गिरने से ट्यूबबैल व हैंडपंपों से पानी निकलना बंद हो गया है। अगर कुछ हैंडपंपों से पानी निकल भी रहा है तो वह पीने योग्य नहीं हैं।

अब हम बात करें इस भीषण जल संकट के बीच पानी के दोहन की। लोगों ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यवसायिक व घरेलू स्तर पर सबमर्सिबल लगा रखे हैं। इसमें होटल, रेस्टोरेंट, ढाबा, मैरिज होम, धुलाई सेंटर और आरओ प्लांट शामिल हैं। ये लोग रोजाना लाखों लीटर पानी जमीन से निकालकर वाहनों व सड़क की सफाई में बर्बाद कर रहे हैं। वहीं उत्तराखंड सरकार की अनदेखी के कारण भी पानी की बर्बादी हो रही है। पाइप लाइन से लीकेज होने और टोटियां खुली रहने के कारण पानी की बर्बादी हो रही है। जल संस्थान कर्मी भी उत्तराखंड में नियमित 15 से 20 फीसदी पानी की बर्बादी होने की बात स्वीकार करते हैं।हैरानी की बात यह है कि लगातार जलशोषण होने के बाद प्रदेश सरकार इसको रोकने के लिए संजीदा नहीं हैं।

देहरादून,हरिद्वार,उधमसिंहनगर,नैनीताल,कोटद्वार में कितने सबमर्सिबल हैं।सरकार के पास इसका भी आंकड़ा नहीं हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार सरकार ने यह आंकड़े जानने के लिए कोई सर्वे भी नहीं कराया है। स्थानीय स्तर पर पानी की बर्बादी रोकने के लिए लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है।

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